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mahabharat 15.26.17: 'वह उपवास करने और वायु पर निर्भर रहने के कारण बहुत दुर्बल हो गया है। उसके शरीर में फैली हुई नसें और नाड़ियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। इस निर्जन वन में ब्राह्मणों को कभी-कभी उसका दर्शन हो जाता है।'॥17॥   |   mahabharat अध्याय 15.26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.26.17 
वायुभक्षो निराहार: कृशो धमनिसन्तत:।
कदाचिद् दृश्यते विप्रै: शून्येऽस्मिन् कानने क्वचित्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'वह उपवास करने और वायु पर निर्भर रहने के कारण बहुत दुर्बल हो गया है। उसके शरीर में फैली हुई नसें और नाड़ियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। इस निर्जन वन में ब्राह्मणों को कभी-कभी उसका दर्शन हो जाता है।'॥17॥
 
‘He has become very weak because he keeps fasting and lives on air. The veins and nerves spread all over his body are clearly visible. Brahmins sometimes get to see him somewhere in this deserted forest.'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)