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mahabharat 15.26.11-12: युधिष्ठिर बोले, "हे राजन! (यहाँ तो सब कुशल है) आपके तप, संयम और आत्मसंयम आदि सद्गुण तो बढ़ रहे हैं न? क्या मेरी माता कुन्ती को आपकी सेवा करने में कष्ट होता है? क्या उनका वनवास सफल होगा?"   |   mahabharat अध्याय 15.26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  15.26.11-12 
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित् ते वर्धते राजंस्तपो दमशमौ च ते॥ ११॥
अपि मे जननी चेयं शुश्रूषुर्विगतक्लमा।
अथास्या: सफलो राजन् वनवासो भविष्यति॥ १२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "हे राजन! (यहाँ तो सब कुशल है) आपके तप, संयम और आत्मसंयम आदि सद्गुण तो बढ़ रहे हैं न? क्या मेरी माता कुन्ती को आपकी सेवा करने में कष्ट होता है? क्या उनका वनवास सफल होगा?"
 
Yudhishthira said, "O King! (Everything is fine here) Your virtues like austerity, self-control and self-control are increasing, aren't they? Does my mother Kunti feel pain in serving you? Will her exile be successful?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)