श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश  » 
 
 
अध्याय 26: धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश
 
श्लोक 1:  धृतराष्ट्र ने पूछा- हे महाबाहु युधिष्ठिर! नगर, जनपद के सभी लोगों और अपने भाइयों सहित आप सब कुशलपूर्वक तो हैं?॥1॥
 
श्लोक 2:  नरेश्वर! जो मन्त्री, सेवक और आचार्य आप पर आश्रित हैं, वे भी सुखी और स्वस्थ हैं न?
 
श्लोक 3:  क्या वे भी आपके राज्य में निर्भय होकर रहते हैं? क्या आप प्राचीन राजाओं की रीति-रिवाजों का पालन करते हैं?॥3॥
 
श्लोक 4:  क्या न्याय-पथ का उल्लंघन किए बिना ही तुम्हारा भण्डार भरा रहता है? क्या तुम शत्रुओं, मित्रों और उदासीन लोगों के प्रति उचित व्यवहार करते हो?॥4॥
 
श्लोक 5:  हे भरतश्रेष्ठ! क्या आप ब्राह्मणों को निःशुल्क भूमि देते हैं और उनका उचित पालन-पोषण करते हैं? क्या वे आपके उत्तम आचरण से संतुष्ट हैं?॥5॥
 
श्लोक 6:  राजन! अपने बन्धु-बान्धवों और सेवकों की तो बात ही छोड़ दीजिए, क्या आपके शत्रु भी आपके आचरण से संतुष्ट हैं? क्या आप देवताओं और पितरों का भी भक्तिपूर्वक पूजन करते हैं?॥6॥
 
श्लोक 7-8h:  भरत! क्या आप भोजन और जल से अतिथियों का स्वागत करते हैं? क्या आपके राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या परिवारजन न्याय के मार्ग पर चलते हैं और अपने कर्तव्य पालन में तत्पर रहते हैं?॥7 1/2॥
 
श्लोक 8-9h:  हे पुरुषश्रेष्ठ! क्या आपके राज्य में स्त्रियों, बालकों और वृद्धों को कष्ट सहना पड़ता है? क्या वे अपनी जीविका के लिए भीख नहीं मांगते? क्या आपके घर में सौभाग्यवती बहुओं और पुत्रियों का आदर और सम्मान होता है?॥8 1/2॥
 
श्लोक 9-10h:  महाराज! आप जैसे राजा के होने से इस राजाओं के वंश को उचित सम्मान मिलता है न? यश से वंचित होकर क्या इसे अपयश नहीं भोगना पड़ता?॥9 1/2॥
 
श्लोक 10-11h:  वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! धृतराष्ट्र द्वारा इस प्रकार कुशलपूर्वक पूछे जाने पर, वार्तालाप में कुशल विधिवेत्ता राजा युधिष्ठिर ने यह कहा -॥10 1/2॥
 
श्लोक 11-12:  युधिष्ठिर बोले, "हे राजन! (यहाँ तो सब कुशल है) आपके तप, संयम और आत्मसंयम आदि सद्गुण तो बढ़ रहे हैं न? क्या मेरी माता कुन्ती को आपकी सेवा करने में कष्ट होता है? क्या उनका वनवास सफल होगा?"
 
श्लोक 13-14:  मेरी बड़ी माता गांधारी देवी शीत, वायु और चलने के परिश्रम से अत्यन्त क्षीण हो गई हैं और घोर तपस्या में लीन हैं। क्या ये देवी युद्ध में मारे गए अपने धर्मात्मा और वीर पुत्रों के लिए कभी शोक करती हैं? और क्या ये हम अपराधियों के लिए कभी कोई अनिष्ट सोचती हैं?॥13-14॥
 
श्लोक 15:  महाराज! संजय तो स्वस्थ और स्थिर होकर ध्यान में लीन हैं न? इस समय विदुरजी कहाँ हैं? हम उन्हें देख नहीं पा रहे हैं।
 
श्लोक 16:  वैशम्पायन कहते हैं - जब राजा युधिष्ठिर ने यह पूछा, तो धृतराष्ट्र ने उनसे कहा - 'बेटा! विदुर जी कुशल से हैं। वे अत्यन्त कठोर तपस्या में लीन हैं।'
 
श्लोक 17:  'वह उपवास करने और वायु पर निर्भर रहने के कारण बहुत दुर्बल हो गया है। उसके शरीर में फैली हुई नसें और नाड़ियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। इस निर्जन वन में ब्राह्मणों को कभी-कभी उसका दर्शन हो जाता है।'॥17॥
 
श्लोक 18-19:  राजा धृतराष्ट्र अभी ऐसा ही कह ही रहे थे कि दूर से जटाधारी और मुँह में पत्थर का टुकड़ा लिए एक दुबले-पतले विदुरजी आते दिखाई दिए। वे नग्न थे। उनका पूरा शरीर मैल से सना हुआ था। वे वन में उड़ती धूल से सने हुए थे। राजा युधिष्ठिर को उनके आगमन की सूचना मिली। हे राजन! विदुरजी उस आश्रम को देखकर अचानक पीछे मुड़े। 18-19.
 
श्लोक 20-21:  यह देखकर राजा युधिष्ठिर अकेले ही उनके पीछे दौड़े। विदुरजी कभी दिखाई देते, कभी अदृश्य। जब वे घने वन में प्रवेश करने लगे, तब राजा युधिष्ठिर बड़े प्रयत्न से उनकी ओर दौड़े और इस प्रकार बोले - 'हे विदुरजी! मैं, आपका परम प्रिय राजा युधिष्ठिर, आपके दर्शन हेतु आया हूँ।'
 
श्लोक 22:  तब समस्त मुनियों में श्रेष्ठ विदुर जी वन में एक अत्यंत पवित्र एवं एकांत स्थान पर एक वृक्ष का सहारा लेकर खड़े हो गए।
 
श्लोक 23:  वे अत्यंत दुर्बल हो गए थे। उनके शरीर का केवल अस्थि-पंजर ही शेष था, यही उनके जीवित होने का एकमात्र चिह्न था। परम बुद्धिमान राजा युधिष्ठिर ने बुद्धिमान विदुर को पहचान लिया॥23॥
 
श्लोक 24:  वह उनके सामने खड़ा हो गया और दूर से ही बोला, जहाँ से विदुरजी सुन सकें; तब राजा ने पास जाकर उनका हार्दिक स्वागत किया॥ 24॥
 
श्लोक 25:  तत्पश्चात् महात्मा विदुरजी राजा युधिष्ठिर की ओर देखने लगे और उनकी दृष्टि से अपनी दृष्टि मिला कर एकाग्र हो गए।
 
श्लोक 26:  बुद्धिमान विदुर ने युधिष्ठिर के शरीर में अपना शरीर, उनके प्राण में अपना प्राण और उनकी इन्द्रियों में अपनी इन्द्रियाँ स्थापित करके उनमें ही विलीन हो गए ॥26॥
 
श्लोक 27:  उस समय विदुरजी तेज से चमक रहे थे और योगबल का आश्रय लेकर धर्मराज युधिष्ठिर के शरीर में प्रवेश कर गए॥ 27॥
 
श्लोक 28:  राजा ने देखा कि विदुरजी का शरीर पहले की तरह पेड़ के सहारे खड़ा है। उनकी आँखें अभी भी स्थिर थीं, लेकिन अब उनके शरीर में कोई चेतना नहीं बची थी।
 
श्लोक 29-30:  इसके विपरीत, उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसमें विशेष शक्ति और अधिक गुण हैं। हे प्रजानाथ! इसके बाद, परम तेजस्वी पाण्डुपुत्र और विद्वान धर्मराज युधिष्ठिर को अपना सम्पूर्ण पूर्व रूप स्मरण हो आया। (उन्हें ज्ञात हुआ कि विदुरजी और मैं एक ही धर्म के अंश से उत्पन्न हुए हैं)। इतना ही नहीं, उस परम तेजस्वी राजा को व्यासजी द्वारा बताया गया योगधर्म भी स्मरण हो आया। 29-30।
 
श्लोक 31-33:  अब विद्वान धर्मराज ने विदुरजी के शरीर का वहीं दाह-संस्कार करने का विचार किया। तभी आकाशवाणी हुई - 'हे राजन! हे भरतपुत्र, शत्रुओं को पीड़ा देने वाले! इस विदुरजी के शरीर का यहाँ दाह-संस्कार करना उचित नहीं है; क्योंकि उन्होंने त्याग धर्म का पालन किया था। यहाँ उनका दाह-संस्कार न करना ही आपके लिए सनातन धर्म है। विदुरजी सनातन लोकों को प्राप्त होंगे; अतः आपको उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए।'॥31-33॥
 
श्लोक 34:  आकाशवाणी से यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ से लौटकर राजा धृतराष्ट्र के पास गये और उनसे ये सारी बातें कहीं।
 
श्लोक 35-36:  विदुरजी की मृत्यु का यह अद्भुत समाचार सुनकर महाप्रतापी राजा धृतराष्ट्र, भीमसेन आदि सभी लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। तत्पश्चात, राजा ने प्रसन्न होकर धर्मराज युधिष्ठिर से कहा - 'पुत्र! अब तुम मेरे द्वारा दिया गया यह फल, मूल और जल ग्रहण करो।'
 
श्लोक 37-38:  ‘हे राजन! मनुष्य को अपने अतिथियों को उन्हीं वस्तुओं से भोजन कराना चाहिए जिनका वह स्वयं उपयोग करता है - यही शास्त्रों की आज्ञा है।’ यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और भाइयों सहित उनके द्वारा अर्पित फल-मूल खाए। तत्पश्चात, उन सभी ने वृक्षों के नीचे केवल फल, मूल और जल खाकर रहने का निश्चय किया और वहीं रात्रि बिताई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)