श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 25: संजयका ऋषियोंसे पाण्डवों, उनकी पत्नियों तथा अन्यान्य स्त्रियोंका परिचय देना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  15.25.1-2 
वैशम्पायन उवाच
स तै: सह नरव्याघ्रैर्भ्रातृभिर्भरतर्षभ।
राजा रुचिरपद्माक्षैरासांचक्रे तदाश्रमे॥ १॥
तापसैश्च महाभागैर्नानादेशसमागतै:।
द्रष्टुं कुरुपते: पुत्रान् पाण्डवान् पृथुवक्षस:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! जिस समय राजा धृतराष्ट्र, कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले सिंहरूपी पुरुष युधिष्ठिर और अपने पाँचों भाइयों सहित आश्रम में बैठे थे, उस समय वहाँ विविध देशों के महान तपस्वी पहले से ही कुरुराज पाण्डु के पुत्र चौड़ी छाती वाले पाण्डवों को देखने के लिए उपस्थित थे। ॥1-2॥
 
Vaishmpayana says, 'Janamejaya! When King Dhritarashtra along with Yudhishthira, the lion-like man with beautiful lotus-like eyes, and his five brothers sat in the hermitage, at that time, great ascetics from various countries were already present there to see the broad-chested Pandavas, the sons of the Kuru King Pandu. ॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)