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mahabharat 15.22.10: "राजेन्द्र! तुम्हारे अहंकार के कारण मैं तुम्हें वहाँ जाने के बारे में स्पष्ट रूप से बताने में झिझक रही थी। सौभाग्य से, आज वह अवसर मिल ही गया।"   |   mahabharat अध्याय 15.22: माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 22: माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  15.22.10 
न हि त्वां गौरवेणाहमशकं वक्तुमञ्जसा।
गमनं प्रति राजेन्द्र तदिदं समुपस्थितम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
"राजेन्द्र! तुम्हारे अहंकार के कारण मैं तुम्हें वहाँ जाने के बारे में स्पष्ट रूप से बताने में झिझक रही थी। सौभाग्य से, आज वह अवसर मिल ही गया।"
 
‘Rajendra! I was hesitant to tell you clearly about going there because of your pride. Fortunately, today that opportunity presented itself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)