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mahabharat 15.22.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! माता को आनन्द देने वाले वे वीर पाण्डव इस प्रकार माता का स्मरण करते हुए अत्यन्त दुःखी हो गये।॥1॥   |   mahabharat अध्याय 15.22: माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 22: माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  15.22.1 
वैशम्पायन उवाच
एवं ते पुरुषव्याघ्रा: पाण्डवा मातृनन्दना:।
स्मरन्तो मातरं वीरा बभूवुर्भृशदु:खिता:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! माता को आनन्द देने वाले वे वीर पाण्डव इस प्रकार माता का स्मरण करते हुए अत्यन्त दुःखी हो गये।॥1॥
 
Vaishmpayana says, 'Janamejaya! Those brave Pandavas, who gave joy to their mother, became very sad while remembering their mother in this manner. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)