एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिण:।
विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिता:॥ ३८॥
अनुवाद
इस प्रकार वे बुद्धिमान ऋषिगण अपनी कथाओं से धृतराष्ट्र को संतुष्ट करके सिद्धगति की शरण में आये और इच्छानुसार विभिन्न स्थानों पर चले गये।
In this way, those wise sages, having satisfied Dhritarashtra with their tales, took refuge in Siddha Gati and went to various places as per their wish.
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि नारदवाक्ये विंशोऽध्याय:॥ २०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥