श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 20: नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तप:सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  15.20.31 
तत्रेयं धृतराष्ट्रस्य कथा समभवन्नृप।
तपसो दुष्करस्यास्य यदयं तपते नृप:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! वहाँ राजा धृतराष्ट्र के विषय में ही बातचीत हो रही थी। उनके द्वारा किए जाने वाले कठिन तप की ही चर्चा हो रही थी॥31॥
 
O Lord of men! The conversation there was only about King Dhritarashtra. The difficult penance that he performs was being discussed.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)