श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 20: नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तप:सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  15.20.30 
नारद उवाच
यदृच्छया शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम्।
दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले - राजर्षे ! एक दिन भगवान की इच्छा से मैं विचरण करता हुआ इन्द्रलोक में गया और वहाँ शचीपति इन्द्र से मेरी भेंट हुई । वहाँ मैंने राजा पाण्डुको के भी दर्शन किये ॥30॥
 
Naradji said – Rajarshe! One day, by the will of God, I went to Indralok while wandering and there I met Sachipati Indra. There I also saw King Panduko. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)