श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 20: नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तप:सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  15.20.3 
तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि।
ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसा: परिचर्यया॥ ३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! कुन्तीदेवी ने उन सबका विधिपूर्वक पूजन किया। वे तपस्वी ऋषिगण भी कुन्ती की सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हुए।
 
Maharaj! Kuntidevi worshipped them all appropriately. Those ascetic sages were also very satisfied with Kunti's service.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)