श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 20: नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तप:सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  15.20.21 
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा कौरवेन्द्रो महात्मा
सार्धं पत्न्या प्रीतिमान् सम्बभूव।
विद्वान् वाक्यं नारदस्य प्रशस्य
चक्रे पूजां चातुलां नारदाय॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यह सुनकर महाकौरवराज धृतराष्ट्र और उनकी पत्नी अत्यन्त प्रसन्न हुए। विद्वान राजा ने नारदजी के वचनों की प्रशंसा की और उनकी अतुलनीय वन्दना की। 21.
 
Vaishampayana says - Janamejaya! On hearing this, the great Kaurava king Dhritarashtra and his wife became very happy. The learned king praised the words of Naradji and worshipped him incomparably. 21.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)