श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 20: नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तप:सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  15.20.1-2 
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्र मुनिश्रेष्ठा राजानं द्र्रष्टुमभ्ययु:।
नारद: पर्वतश्चैव देवलश्च महातपा:॥ १॥
द्वैपायन: सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिण:।
शतयूपश्च राजर्षिर्वृद्ध: परमधार्मिक:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात् नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, महर्षि व्यास अपने शिष्यों तथा अन्य सिद्धों, ऋषियों और महात्माओं के साथ राजा धृतराष्ट्र से मिलने वहाँ आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध ऋषि शत्युप भी आये।
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Narad, Parvat, great ascetic Deval, Maharishi Vyas with his disciples and other Siddhas, sages and great sages came there to meet King Dhritarashtra. The highly religious old sage Shatyup also came with him. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)