श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 2: पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  15.2.1 
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरम्बिकासुत:।
विजहार यथापूर्वमृषिभि: पर्युपासित:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! इस प्रकार पाण्डवों द्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पहले की भाँति ऋषियों के साथ मिलन का सुख भोगते हुए वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे॥1॥
 
Vaishampayanji says – King! In this way, Ambikanandan being well respected by the Pandavas, King Dhritarashtra, enjoying the pleasure of meeting with the sages as before, started living there happily. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)