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mahabharat 15.18.8: हे धर्म को जानने वाली गांधारी, मैं अपनी पुत्रवधू कुंती के पालन-पोषण से अत्यन्त संतुष्ट हूँ; अतः आप कृपा करके उसे आज ही घर लौटने की अनुमति प्रदान करें।'   |   mahabharat अध्याय 15.18: पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगातटपर निवास करना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 18: पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगातटपर निवास करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  15.18.8 
गान्धारि परितुष्टोऽस्मि वध्वा: शुश्रूषणेन वै।
तस्मात् त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म को जानने वाली गांधारी, मैं अपनी पुत्रवधू कुंती के पालन-पोषण से अत्यन्त संतुष्ट हूँ; अतः आप कृपा करके उसे आज ही घर लौटने की अनुमति प्रदान करें।'
 
Gandhari, who knows the Dharma, I am very satisfied with the care and care of my daughter-in-law Kunti; therefore, please allow her to return home today.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)