श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 17: कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  15.17.5 
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपम:।
पुनर्वने न दु:खी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मैंने तुम्हें युद्ध करने के लिए इसलिए प्रोत्साहित किया था कि तुम पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ और इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली राजा होकर फिर वनवास का दुःख न भोगो॥5॥
 
I had encouraged you to fight the war so that you, being the best among the virtuous and a king as prosperous as Indra, may not again suffer the pain of exile. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)