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mahabharat 15.17.12: मेरे ससुर और अन्य सभी कौरव चुपचाप बैठे थे और द्रौपदी अपनी रक्षा के लिए भगवान को पुकार रही थी और कुररी की तरह चिल्ला रही थी।   |   mahabharat अध्याय 15.17: कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 17: कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  15.17.12 
निषण्णा: कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादय:।
सा दैवं नाथमिच्छन्ती व्यलपत् कुररी यथा॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मेरे ससुर और अन्य सभी कौरव चुपचाप बैठे थे और द्रौपदी अपनी रक्षा के लिए भगवान को पुकार रही थी और कुररी की तरह चिल्ला रही थी।
 
My father-in-law and all other Kauravas were sitting quietly and Draupadi, seeking protection for herself, was crying out to the Lord and like a Kurri.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)