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mahabharat 15.16.29: देवी कुन्ती ने शुद्ध हृदय से वन में रहने का निश्चय कर लिया था, इसलिए उन्होंने अपने पुत्रों की प्रार्थना नहीं सुनी, जो तरह-तरह से विलाप कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 15.16: धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  15.16.29 
इति सा निश्चितैवाशु वनवासाय भाविनी।
लालप्यतां बहुविधं पुत्राणां नाकरोद् वच:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
देवी कुन्ती ने शुद्ध हृदय से वन में रहने का निश्चय कर लिया था, इसलिए उन्होंने अपने पुत्रों की प्रार्थना नहीं सुनी, जो तरह-तरह से विलाप कर रहे थे।
 
Devi Kunti, having a pure heart, had already resolved to stay in the forest; therefore, she did not listen to the request of her sons, who were lamenting in various ways.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)