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mahabharat 15.13.8: हे मनुष्यों के स्वामी! क्षत्रियों का धर्म तो यही है। भीमसेन प्रायः युद्ध और क्षत्रिय धर्म में लगे रहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 15.13: विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना   ।   mahabharat पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 13: विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  15.13.8 
एवं प्रायो हि धर्मोऽयं क्षत्रियाणां नराधिप।
युद्धे क्षत्रियधर्मे च निरतोऽयं वृकोदर:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! क्षत्रियों का धर्म तो यही है। भीमसेन प्रायः युद्ध और क्षत्रिय धर्म में लगे रहते हैं।
 
O Lord of men! This is usually the religion of Kshatriyas. Bhimsena is usually engaged in war and Kshatriya Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)