श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  15.12.2 
न स्मरन्त्यपराद्धानि स्मरन्ति सुकृतान्यपि।
असम्भिन्नार्यमर्यादा: साधव: पुरुषोत्तमा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
जिन्होंने आर्यों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया है, वे साधु स्वभाव वाले श्रेष्ठ पुरुष दूसरों के अपराधों को नहीं, अपितु उनके उपकारों को ही स्मरण रखते हैं। 2.
 
Those who have not violated the decorum of the Aryans, those noble men with a saintly nature do not remember the crimes of others, but only their favours. 2.
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