श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 11: धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध  »  श्लोक 21-23h
 
 
श्लोक  15.11.21-23h 
क्व तदा धृतराष्ट्रस्य स्नेहोऽस्मद्‍गोचरो गत:॥ २१॥
कृष्णाजिनोपसंवीतो हृताभरणभूषण:।
सार्धं पाञ्चालपुत्र्या त्वं राजानमुपजग्मिवान्॥ २२॥
क्व तदा द्रोणभीष्मौ तौ सोमदत्तोऽपि वाभवत्।
 
 
अनुवाद
उन दिनों धृतराष्ट्र का हम पर प्रेम कहाँ चला गया था? जब तुम्हारे आभूषण उतारकर, शरीर पर काले मृगचर्म ओढ़कर तुम द्रौपदी के साथ राजा के पास गए थे, उस समय द्रोणाचार्य और भीष्म कहाँ थे? सोमदत्त कहाँ गया था?
 
Where did Dhritarashtra's love for us go in those days? When your ornaments and jewellery were taken off and you covered your body with black deerskin and went to the king with Draupadi, where were Dronacharya and Bhishma at that time? Where did Somdatta go?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)