श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 10: प्रजाकी ओरसे साम्ब नामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना  »  श्लोक 47-48h
 
 
श्लोक  15.10.47-48h 
भवत्कृतमिमं स्नेहं युधिष्ठिरविवर्धितम्॥ ४७॥
न पृष्ठत: करिष्यन्ति पौरा जानपदा जना:।
 
 
अनुवाद
'युधिष्ठिर ने प्रजा के प्रति आपके स्नेह को और भी बढ़ा दिया है। नगर और जनपद की प्रजा आपके इस प्रेम को कभी अनदेखा नहीं करेगी।'
 
‘The affection you had for your subjects has been increased even more by Yudhishthira. The people of the city and the district will never ignore your love for the people.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)