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भवत्कृतमिमं स्नेहं युधिष्ठिरविवर्धितम्॥ ४७॥
न पृष्ठत: करिष्यन्ति पौरा जानपदा जना:।
अनुवाद
'युधिष्ठिर ने प्रजा के प्रति आपके स्नेह को और भी बढ़ा दिया है। नगर और जनपद की प्रजा आपके इस प्रेम को कभी अनदेखा नहीं करेगी।'
‘The affection you had for your subjects has been increased even more by Yudhishthira. The people of the city and the district will never ignore your love for the people.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥