श्री महाभारत  »  पर्व 15: आश्रमवासिक पर्व  »  अध्याय 10: प्रजाकी ओरसे साम्ब नामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  15.10.25 
नात्र वाच्यं महाराज सुसूक्ष्ममपि विद्यते।
उषिता: स्म सुखं नित्यं भवता परिपालिता:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उसमें किंचितमात्र भी दोष नहीं है। हम लोग आपके द्वारा रक्षित होकर उसके राज्य में सदैव सुखपूर्वक रहते आये हैं॥ 25॥
 
‘Maharaj! There is not even the smallest flaw in him. We have always lived happily in his kingdom, protected by you.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)