vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 99: भूमि-दान, तिल-दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा
»
श्लोक d5
श्लोक
14.99.d5
न हि भूमिप्रदानाद् वै दानमन्यद् विशिष्यते।
न चापि भूमिहरणात् पापमन्यद् विशिष्यते॥
अनुवाद
क्योंकि भूमि दान से बड़ा कोई दान नहीं है और भूमि छीनने से बड़ा कोई पाप नहीं है।
Because there is no greater donation than the donation of land, and there is no greater sin than snatching away land.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×