श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 99: भूमि-दान, तिल-दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा  »  श्लोक d1-d3
 
 
श्लोक  14.99.d1-d3 
श्रीभगवानुवाच
अत: परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानमनुत्तमम्॥
य: प्रयच्छति विप्राय भूमिं रम्यां सदक्षिणाम्।
श्रोत्रियाय दरिद्राय साग्निहोत्राय पाण्डव॥
स सर्वकामतृप्तात्मा सर्वरत्नविभूषित:।
सर्वपापविनिर्मुक्तो दीप्यमानोऽर्कवत् तदा॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले- पाण्डुनन्दन! अब मैं उत्तम भूमिदान का वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य श्रोत्रिय अग्निहोत्री दरिद्र ब्राह्मण को सुन्दर भूमिका दक्षिणा दान करता है, वह उस समय सभी सुखों से तृप्त, समस्त रत्नों से विभूषित तथा समस्त पापों से मुक्त होकर सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है।
 
Shri Bhagwan said-Pandunandan! Now let me describe the best land donation. The person who donates the beautiful role of Dakshina to the poor Brahmin of Shrotriya Agnihotri, at that time he is satisfied with all the pleasures, adorned with all the gems and free from all sins and becomes radiant like the sun.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)