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mahabharat 14.97.d60-d61: जिन्होंने इस लोक में जल से भरे हुए बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरे, पोखरे और जलाशय बनवाये हैं, वे चन्द्रमा के समान उज्ज्वल और दिव्य घंटियों की ध्वनि से ध्वनित विमानों पर बैठकर यमलोक को जाते हैं; उस समय वे महात्मा सदा संतुष्ट और अत्यंत तेजस्वी दिखाई देते हैं और दिव्य लोक के पुरुष उन पर ताड़ के पंखे और मालाओं की वर्षा करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय  »  श्लोक d60-d61
 
 
श्लोक  14.97.d60-d61 
तेषां वाप्यश्च कूपाश्च तटाकानि सरांसि च।
दीर्घिका: पुष्करिण्यश्च सजलाश्च जलाशया:॥
यानैस्ते यान्ति चन्द्राभैर्दिव्यघण्टानिनादितै:।
चामरैस्तालवृन्तैश्च वीज्यमाना: महाप्रभा:।
नित्यतृप्ता महात्मानो गच्छन्ति यमसादनम्॥
 
 
अनुवाद
जिन्होंने इस लोक में जल से भरे हुए बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरे, पोखरे और जलाशय बनवाये हैं, वे चन्द्रमा के समान उज्ज्वल और दिव्य घंटियों की ध्वनि से ध्वनित विमानों पर बैठकर यमलोक को जाते हैं; उस समय वे महात्मा सदा संतुष्ट और अत्यंत तेजस्वी दिखाई देते हैं और दिव्य लोक के पुरुष उन पर ताड़ के पंखे और मालाओं की वर्षा करते हैं।
 
Those who have built stepwells, wells, ponds, ponds, ponds and reservoirs filled with water in this world, they go to Yamalok sitting on planes as bright as the moon and sounding with the sound of divine bells; At that time, that Mahatma appears ever-satisfied and very radiant and the men of the divine world shower him with palm fans and rosaries.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)