श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 97: यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय  »  श्लोक d10-d11
 
 
श्लोक  14.97.d10-d11 
न मण्डपं सभा वापि न प्रपा न निकेतनम्।
न पर्वतो नदी वापि न भूमेर्विवरं क्वचित् ॥
न ग्रामो नाश्रमो वापि नोद्यानं वा वनानि च।
न किंचिदाश्रयस्थानं पथि तस्मिन् युधिष्ठिर॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! उस मार्ग में कोई मंडप, बैठक, प्याऊ, घर, पर्वत, नदी, गुफा, गाँव, आश्रम, बगीचा, वन या अन्य कोई ठहरने का स्थान नहीं है।
 
Yudhishthira! On that route there is no pavilion, sitting room, drinking water stall, house, mountain, river, cave, village, ashram, garden, forest or any other place to stay.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)