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mahabharat 14.96.d9: अशुद्ध गर्भ से उत्पन्न मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध, दान, भोजन, वार्तालाप, शयन और सम्बन्ध आदि में भाग लेने के योग्य नहीं होते।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d9
 
 
श्लोक  14.96.d9 
दैवे पित्र्ये तथा दाने भोजने सहभाषणे।
शयने सह सम्बन्धे न योग्या दुष्टयोनिजा:॥
 
 
अनुवाद
अशुद्ध गर्भ से उत्पन्न मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध, दान, भोजन, वार्तालाप, शयन और सम्बन्ध आदि में भाग लेने के योग्य नहीं होते।
 
Human beings born from impure wombs are not fit to take part in yajnas, shraddhas, almsgiving, eating, conversations, sleeping and relationships etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)