Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.96.d38: पृथ्वी पर समुद्र पर्यन्त जितने श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, वे सब मेरे ही स्वरूप हैं। उनकी पूजा करने से मेरी भी पूजा होती है।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d38
 
 
श्लोक  14.96.d38 
ये केचित् सागरान्तायां पृथिव्यां द्विजसत्तमा:।
मम रूपं हि तेष्वेवमर्चितेष्वर्चितोऽस्म्यहम्॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी पर समुद्र पर्यन्त जितने श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, वे सब मेरे ही स्वरूप हैं। उनकी पूजा करने से मेरी भी पूजा होती है।
 
All the great Brahmins on the earth up to the sea are my manifestation. By worshipping them, I am also worshipped.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)