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mahabharat 14.96.d34: हे भरतश्रेष्ठ! इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्राह्मण की पूजा करने से मेरी भी पूजा होती है और ब्राह्मण को कठोर वचन बोलने से मैं स्वयं उन कठोर वचनों का भागी बनता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d34
 
 
श्लोक  14.96.d34 
ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोऽस्मि न संशय:।
आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्राह्मण की पूजा करने से मेरी भी पूजा होती है और ब्राह्मण को कठोर वचन बोलने से मैं स्वयं उन कठोर वचनों का भागी बनता हूँ।
 
O best of the Bharatas! There is no doubt that by worshipping a Brahmin I too am worshipped, and by speaking harsh words to a Brahmin I myself become the target of those harsh words.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)