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mahabharat 14.96.d32-d33: श्री भगवान बोले - भरत! कोई चाहे एक हजार भार गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थ जलाकर मुझे धूप दे, मुझे निरन्तर नमस्कार करे, अनेक प्रकार की भेंटें देकर मेरी पूजा करे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की ऋचाओं से मेरी स्तुति करता रहे; किन्तु यदि वह ब्राह्मण को संतुष्ट न कर सके तो मैं उस पर प्रसन्न नहीं होऊँगा।   |   mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन  »  श्लोक d32-d33
 
 
श्लोक  14.96.d32-d33 
श्रीभगवानुवाच
यदि भारसहस्रं तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत्।
करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत्॥
स्तौति य: स्तुतिभिर्मां च ऋग्यजु:सामभि: सदा।
न तोषयति चेद् विप्रान् नाहं तुष्यामि भारत॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - भरत! कोई चाहे एक हजार भार गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थ जलाकर मुझे धूप दे, मुझे निरन्तर नमस्कार करे, अनेक प्रकार की भेंटें देकर मेरी पूजा करे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की ऋचाओं से मेरी स्तुति करता रहे; किन्तु यदि वह ब्राह्मण को संतुष्ट न कर सके तो मैं उस पर प्रसन्न नहीं होऊँगा।
 
Sri Bhagavan said - Bharata! Someone should burn a thousand loads of fragrant substances like guggul and offer me incense, salute me continuously, offer many gifts and worship me and keep on praising me with the hymns of Rigveda, Yajurveda and Samveda; but if he is not able to satisfy the Brahmin then I will not be pleased with him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)