Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.96.d1-d2: वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! इस प्रकार सात्त्विक, राजस और तामसिक दानों का, उनकी भिन्न-भिन्न गतियों का तथा भिन्न-भिन्न फलों का वर्णन सुनकर धर्मात्मा युधिष्ठिर का हृदय अत्यन्त प्रसन्न हुआ। धर्मरूपी इस पवित्र अमृत को पीकर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई, अतः उन्होंने पुनः भगवान श्रीकृष्ण से कहा - | mahabharat अध्याय 14.96: बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री-जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन! इस प्रकार सात्त्विक, राजस और तामसिक दानों का, उनकी भिन्न-भिन्न गतियों का तथा भिन्न-भिन्न फलों का वर्णन सुनकर धर्मात्मा युधिष्ठिर का हृदय अत्यन्त प्रसन्न हुआ। धर्मरूपी इस पवित्र अमृत को पीकर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई, अतः उन्होंने पुनः भगवान श्रीकृष्ण से कहा -
Vaishampayanji says – King! Thus, hearing the description of Sattvik, Rajas and Tamasic donations, their different speeds and different results, the heart of the pious Yudhishthira became very happy. He was not satisfied by drinking this sacred nectar of religion, hence he again said to Lord Krishna -
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥