श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 95: व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा  »  श्लोक d64
 
 
श्लोक  14.95.d64 
आमन्त्र्य तु निराशानि न कर्तव्यानि भारत।
कुलानि सुदरिद्राणि तेषामाशा हता भवेत्॥
 
 
अनुवाद
भारत! गरीब ब्राह्मणों को बुलाकर निराश मत लौटाओ, अन्यथा उनकी आशाएँ नष्ट हो जाएँगी।
 
Bharat! Do not invite poor Brahmins and send them back disappointed, otherwise their hopes will be dashed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)