श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 95: व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा  »  श्लोक d3-d4
 
 
श्लोक  14.95.d3-d4 
कीदृशासु ह्यवस्थासु दानं दत्तं जनार्दन।
इह लोकेऽनुभवति पुरुष: पुरुषोत्तम॥
गर्भस्थ: किं समश्नाति किं बाल्ये वापि केशव।
यौवनस्थेऽपि किं कृष्ण वार्धके वापि किं भवेत् ॥
 
 
अनुवाद
पुरुषोत्तम! जनार्दन! इस लोक में मनुष्य किस अवस्था में दिए गए दान का फल भोगता है? केशव! गर्भ में मनुष्य किस दान का फल भोगता है? श्रीकृष्ण! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में मनुष्य किस दान का फल भोगता है?
 
‘Purushottam! Janardan! In which state does a man experience the fruits of the donations given in this world? Keshav! The fruit of which donation does a man enjoy while in the womb? Shri Krishna! The fruit of which donations does a man enjoy during childhood, youth and old age?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)