श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 94: चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय  »  श्लोक d30
 
 
श्लोक  14.94.d30 
श्रीभगवानुवाच
शृणु पार्थिव तत्सर्वं धर्मसूक्ष्मं सनातनम्।
दुर्विज्ञेयतमं नित्यं यत्र मग्ना महाजना:॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - राजन! तुमने जो धर्म का सार पूछा है, वह सूक्ष्म, शाश्वत, अत्यंत कठिन और स्थायी है। बड़े-बड़े लोग भी उसमें खो जाते हैं। तुम सब उसे सुनो।
 
Sri Bhagavan said - King! The essence of religion that you have asked about is subtle, eternal, extremely difficult to know and permanent. Even great people get lost in it. Listen to all of it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)