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mahabharat 14.93.d62: भरतनन्दन! समस्त प्राणी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं और मेरे ही स्वरूप हैं। फिर भी वे मेरी ही माया से मोहित रहते हैं, इसीलिए मुझे नहीं जान पाते।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d62 
मया सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत।
मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! समस्त प्राणी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं और मेरे ही स्वरूप हैं। फिर भी वे मेरी ही माया से मोहित रहते हैं, इसीलिए मुझे नहीं जान पाते।
 
Bharatanandan! All beings are born from me and are my manifestation. Even then they remain enchanted by my illusion, that is why they are unable to know me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)