श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d60
 
 
श्लोक  14.93.d60 
यावन्मात्रं भवेद् भूतं स्थूलं सूक्ष्ममदं जगत‍्।
जीवभूतो ह्यहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठित:॥
 
 
अनुवाद
यह संसार चाहे स्थूल हो या सूक्ष्म, जो भी रूप में हो चुका है या होगा, मैं उन सबमें जीव रूप में समान रूप से विद्यमान हूँ।
 
Whatever gross or subtle forms this world has become or will become, I am present in them all in the same way in the form of a living being.
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