श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d55
 
 
श्लोक  14.93.d55 
संहृत्याहं जगत‍् सर्वं कृत्वा वै गर्भमात्मन:।
शयामि दिव्ययोगेन प्रलयेषु युधिष्ठिर॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् का नाश करके मैं उसे अपने उदर में धारण करता हूँ और दिव्य योग का आश्रय लेकर समुद्र के जल में शयन करता हूँ।
 
Yudhishthira! During the time of deluge, after destroying the whole world, I keep it in my stomach and taking shelter of divine yoga, I sleep in the waters of the ocean.
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