श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d54
 
 
श्लोक  14.93.d54 
चातुराश्रमधर्मोऽहं चातुर्होत्रफलाशन:।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्यज्ञश्चतुराश्रमभावन:॥
 
 
अनुवाद
मैं चारों आश्रमों के धर्म को प्रकट करने वाला, चतुर्व्यूह, चतुर्यज्ञ तथा चार प्रकार के अनुष्ठानों से सम्पन्न यज्ञ के फल को भोगने वाला हूँ।'
 
I am the one who reveals the Dharma of the four Ashrams, the Chaturvyuh, the Chaturyagya and the one who enjoys the fruits of the Yagya performed with the four types of rituals.'
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