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mahabharat 14.93.d50: मैं पृथ्वी को सब ओर से धारण करता हूँ और सबके हृदय में नाभि से दस अंगुल ऊपर स्थित हूँ। मैं सभी प्राणियों के आत्मा रूप में स्थित हूँ, इसीलिए मुझे सर्वव्यापी कहा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d50 
धृत्वोर्वीं सर्वत: सम्यगत्यतिष्ठं दशाङ्गुलम्।
सर्वभूतात्मभूतस्थ: सर्वव्यापी ततोऽस्म्यहम्॥
 
 
अनुवाद
मैं पृथ्वी को सब ओर से धारण करता हूँ और सबके हृदय में नाभि से दस अंगुल ऊपर स्थित हूँ। मैं सभी प्राणियों के आत्मा रूप में स्थित हूँ, इसीलिए मुझे सर्वव्यापी कहा जाता है।
 
I hold the earth from all sides and am present in everyone's heart ten fingers higher than the navel. I am situated in the soul form of all living beings, that is why I am called omnipresent.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)