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mahabharat 14.93.d47-d48: मैं आकाश में एक गुण वाली, वायु में दो गुणों वाली, अग्नि में तीन गुणों वाली और जल में चार गुणों वाली हूँ। मैं पृथ्वी में पाँच गुणों वाली स्थित हूँ। मैं तन्मात्रा रूप में शब्द आदि पाँच गुणों वाली पाँच महाभूतों में स्थित हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d47-d48
 
 
श्लोक  14.93.d47-d48 
स्थितो ह्येकगुण: खेऽहं द्विगुणश्चास्मि मारुते।
त्रिगुणोऽग्नौ स्थितोऽहं वै सलिले च चतुर्गुण:॥
शब्दाद्या ये गुणा: पञ्च महाभूतेषु पञ्चसु।
तन्मात्रासंस्थित: सोऽहं पृथिव्यां पञ्चधा स्थित:॥
 
 
अनुवाद
मैं आकाश में एक गुण वाली, वायु में दो गुणों वाली, अग्नि में तीन गुणों वाली और जल में चार गुणों वाली हूँ। मैं पृथ्वी में पाँच गुणों वाली स्थित हूँ। मैं तन्मात्रा रूप में शब्द आदि पाँच गुणों वाली पाँच महाभूतों में स्थित हूँ।
 
In the sky I am of one quality, in the air I am of two qualities, in the fire I am of three qualities and in the water I am of four qualities. I am situated in the earth with five qualities. I, in the form of Tanmatra, am present in the five great elements with five qualities like words etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)