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mahabharat 14.93.d40: हजारों-करोड़ों कल्प बीत गए, किन्तु मैं अपने भक्तों को उसी वैष्णव रूप में दर्शन देता हूँ, जिस रूप में देवता दर्शन देते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d40 
कल्पकोटिसहस्रेषु व्यतीतेष्वागतेषु च।
दर्शयामीह तद् रूपं यच्च पश्यन्ति मे सुरा:॥
 
 
अनुवाद
हजारों-करोड़ों कल्प बीत गए, किन्तु मैं अपने भक्तों को उसी वैष्णव रूप में दर्शन देता हूँ, जिस रूप में देवता दर्शन देते हैं।
 
‘Thousands and crores of kalpas have come and gone, but I appear to my devotees in the same Vaishnava form that the gods see.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)