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mahabharat 14.93.d4-d5: युधिष्ठिर बोले—भक्तप्रेमी! मैं सच्ची भक्ति से आपके चरणों में आया हूँ। हे प्रभु! यदि आप मुझे अपना प्रेमी या भक्त मानते हैं और यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो कृपया मुझे वैष्णव धर्म का वर्णन कीजिए। मैं इसके समस्त रहस्यों को यथार्थ रूप में जानना चाहता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d4-d5 
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वतस्तव भावेन पादमूलमुपागतम्।
यदि जानासि मां भक्तं स्निग्धं वा भक्तवत्सल॥
धर्मगुह्यानि सर्वाणि वेत्तुमिच्छामि तत्त्वत:।
धर्मान् कथय मे देव यद्यनुग्रहभागहम्॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले—भक्तप्रेमी! मैं सच्ची भक्ति से आपके चरणों में आया हूँ। हे प्रभु! यदि आप मुझे अपना प्रेमी या भक्त मानते हैं और यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो कृपया मुझे वैष्णव धर्म का वर्णन कीजिए। मैं इसके समस्त रहस्यों को यथार्थ रूप में जानना चाहता हूँ।
 
Yudhishthira said—Devotee-loving! I have come to your feet with true devotion. O Lord! If you consider me your lover or devotee and if I deserve your grace, then please describe to me the Vaishnava religion. I want to know all its secrets in reality.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)