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mahabharat 14.93.d37: हजारों जन्मों तक तपस्या करने के बाद जब मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तब निस्संदेह उसमें भक्ति उत्पन्न होती है।   |   mahabharat अध्याय 14.93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.93.d37 
जन्मान्तरसहस्रेषु तपसा भावितात्मनाम्।
भक्तिरुत्पद्यते तात मनुष्याणां न संशय:॥
 
 
अनुवाद
हजारों जन्मों तक तपस्या करने के बाद जब मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तब निस्संदेह उसमें भक्ति उत्पन्न होती है।
 
When the conscience of a man becomes pure after performing austerities for thousands of births, then devotion undoubtedly arises in him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)