श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d36
 
 
श्लोक  14.93.d36 
अपि पापेष्वभिरता मद्भक्ता: पाण्डुनन्दन।
मुच्यन्ते पातकै: सर्वै: पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! यदि पाप में लिप्त मनुष्य भी मेरे भक्त हो जाएँ, तो वे सब पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाते हैं, जैसे कमल का पत्ता जल से अछूता रहता है।
 
O son of Pandu! If even the people who are involved in sins become my devotees, then they get freed from all the sins just like the lotus leaf remains untouched by water.
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