श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d33
 
 
श्लोक  14.93.d33 
मानुष्यं भावमापन्नं ये मां गृह्णन्त्यवज्ञया।
संसारान्तर्हि ते मूढास्तिर्यग्योनिष्वनेकश:॥
 
 
अनुवाद
जो लोग मुझे केवल मनुष्य शरीर में ही जानकर मेरी उपेक्षा करते हैं, वे मूर्ख हैं और संसार में पशु योनियों में बार-बार भटकते रहते हैं।
 
Those who disregard me, knowing me only in the human body, are fools and keep wandering again and again in the animal forms within the world.
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