श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d31
 
 
श्लोक  14.93.d31 
इष्टस्त्वमसि मेऽत्यर्थं प्रपन्नश्चापि मां सदा।
परमार्थमपि ब्रूयां किं पुनर्धर्मसंहिताम्॥
 
 
अनुवाद
‘तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो और सदैव मेरी शरण में रहो। यदि तुम पूछो तो मैं आत्मा के परम गुप्त तत्त्व का वर्णन कर सकता हूँ, फिर धर्म की संहिता के विषय में क्या कहा जा सकता है?
 
‘You are very dear to me and always stay in my refuge. If you ask, I can describe the most secret essence of the soul, then what can be said about the code of religion?
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