श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d29
 
 
श्लोक  14.93.d29 
एवं धर्म: कृत: शुुद्धो नयते गतिमुत्तमाम्।
अधर्मं सेवते यस्तु तिर्यग्योन्यां पतत्यसौ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार शुद्ध भाव से किया गया धर्म का पालन उत्तम गति की प्राप्ति कराता है, किन्तु जो अधर्म में लिप्त रहते हैं, उन्हें पशु, पक्षी आदि प्राणियों की योनियों में गिरना पड़ता है।
 
Thus, the observance of Dharma done with pure intentions leads to the attainment of the best state, but those who indulge in unrighteousness have to fall into the animal, bird and other animal forms.
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