श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 93: युधिष्ठिरका वैष्णव-धर्मविषयक प्रश्न और भगवान‍् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d17
 
 
श्लोक  14.93.d17 
एतेभ्य: सर्वधर्मेभ्यो देव त्वन्मुखनि:सृता:।
पावनत्वात् पवित्रत्वाद् विशिष्टा इति मे मति:॥
 
 
अनुवाद
परन्तु हे प्रभु! मुझे विश्वास है कि आपके मुख से जो धर्म प्रकट हुआ है, वह शुद्ध एवं पवित्र होने के कारण उपर्युक्त समस्त धर्मों से श्रेष्ठ है।
 
But, O Lord! I am sure that the Dharma which has been revealed from your mouth is superior to all the above mentioned Dharmas because of its being pure and sacred.
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