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mahabharat 14.92.8-9: वे सभी धर्म के प्रत्यक्ष अनुयायी, क्रोध पर विजय पाने वाले, आत्मसंयमी, मन-संयमी, हिंसा और अहंकार से रहित तथा सदा शुद्ध सदाचार में स्थित थे। उन्हें कभी किसी इंद्रिय ने बाधा नहीं पहुँचाई। ऐसे महान ऋषिगण उस यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए वहाँ उपस्थित थे। 8-9.   |   mahabharat अध्याय 14.92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  14.92.8-9 
सर्वे प्रत्यक्षधर्माणो जितक्रोधा जितेन्द्रिया:।
दमे स्थिताश्च सर्वे ते हिंसादम्भविवर्जिता:॥ ८॥
वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रियैश्चाप्यबाधिता:।
उपातिष्ठन्त तं यज्ञं यजन्तस्ते महर्षय:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वे सभी धर्म के प्रत्यक्ष अनुयायी, क्रोध पर विजय पाने वाले, आत्मसंयमी, मन-संयमी, हिंसा और अहंकार से रहित तथा सदा शुद्ध सदाचार में स्थित थे। उन्हें कभी किसी इंद्रिय ने बाधा नहीं पहुँचाई। ऐसे महान ऋषिगण उस यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए वहाँ उपस्थित थे। 8-9.
 
All of them were direct followers of Dharma, conquerors of anger, self-controlled, mind-controlled, free from violence and arrogance and always established in pure good conduct. They were never hindered by any of the senses. Such great sages were present there to perform that Yagya. 8-9.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)