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mahabharat 14.92.35-37h: जनमेजय! जब ऋषिगण ये बातें कह रहे थे, उसी समय परम तेजस्वी देवराज इन्द्र ने ऋषि की तपशक्ति देखकर वर्षा आरम्भ कर दी। जब तक यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ, तब तक महाबली इन्द्र उनकी इच्छानुसार वहाँ वर्षा करते रहे। 35-36 1/2।   |   mahabharat अध्याय 14.92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा  »  श्लोक 35-37h
 
 
श्लोक  14.92.35-37h 
तथा कथयतां तेषां देवराज: पुरंदर:॥ ३५॥
ववर्ष सुमहातेजा दृष्ट्वा तस्य तपोबलम्।
आसमाप्तेश्च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रम:॥ ३६॥
निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय।
 
 
अनुवाद
जनमेजय! जब ऋषिगण ये बातें कह रहे थे, उसी समय परम तेजस्वी देवराज इन्द्र ने ऋषि की तपशक्ति देखकर वर्षा आरम्भ कर दी। जब तक यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ, तब तक महाबली इन्द्र उनकी इच्छानुसार वहाँ वर्षा करते रहे। 35-36 1/2।
 
Janamejaya! When the sages were saying these things, at that very time the very illustrious Devraj Indra, seeing the austerity power of the sage, started raining. Until the yajna was not completed, the immensely powerful Indra rained there as per his wish. 35-36 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)